मुस्लिम वोट बटोरने निकले ‘ कांग्रेस’ के नसीमुद्दीन सिद्दिकी, क्या लगा पाएंगे अतीक अहमद के वोट बैंक में सेंध

गाजियाबाद। बसपा के नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ जलालुद्दीन सिद्दीकी भी कांग्रेसी हो गए। नसीमुद्दीन सिद्दीकी कभी बसपा में नंबर दो की हैसियत के नेता माने जाते थे। जलालुद्दीन सिद्दीकी को उनका बेहद करीबी माना जाता है। पिछले वर्ष मई में जब बसपा को नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अलविदा कहा तो जलालुद्दीन सिद्दीकी ने भी 10 मई, 2017 को बसपा को अलविदा कह दिया था। इसके बाद न नसीमुद्दीन सिद्दीकी किसी राजनैतिक दल में गए और जब उन्होंने कोई नई पार्टी ज्वाइन नहीं की तो जलालुद्दीन सिद्दीकी भी इस अवधि में बिना पार्टी के केवल नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ रहे।
गुरुवार को जब नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस ज्वाइन की तो जलालुद्दीन सिद्दीकी भी उनके साथ कांग्रेसी हो गए। अब जलालुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस में आने के बाद गाजियाबाद की कांग्रेस की मुस्लिम सियासत में इसके इफेक्ट दिखाई देंगे। कांग्रेस का वोट बैंक मुस्लिम भी माना जाता है।
एक दशक में यह वोट बैंक सपा की तरफ चला गया था और इस वोट बैंक में बसपा ने भी सेंध लगाई थी। लेकिन हाल के चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि यह वोट बैंक वापस कांग्रेस की तरफ लौट रहा है। कांग्रेस अब अन्य दलों के मुस्लिम नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए जुट गई है। यहां उसने पहला मास्टर स्ट्रोक नसीमुद्दीन सिद्दीकी के रूप में मारा है। गाजियाबाद में कांग्रेस को लंबे समय से एक मुस्लिम चेहरे की तलाश थी। यहां यदि कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं की बात की जाए तो पूर्व कार्यवाहक जिलाध्यक्ष हाजी लियाकत, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता इस्माइल खान, नगर निगम में पार्षद दल के नेता जाकिर सैफी, अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष नसीम खान से आगे यह गिनती नहीं जाती है। जाकिर सैफी अच्छे नेता हैं। मुद्दों को मजबूती से उठाते हैं। लेकिन उनकी राजनीति का फोकस नगर निगम से आगे नहीं जा पाता है। इस्माइल खान कांग्रेस के पुराने नेता हैं। लेकिन उन्हें कांग्रेस से वह नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। कांग्रेस ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया और फिर इस्माइल खान ने भी कांग्रेस की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया। नसीम खान युवा नेता हैं। हज हाउस प्रकरण के बाद वह चर्चा में आए हैं। सोशल मीडिया पर उन्होंने मुस्लिम नेता को संगठन में मुख्य पद देने के लिए एक माहौल भी बनाया था। लेकिन वह भी सोशल मीडिया के ही नेता ज्यादा रहे और जन नेता बनने में अभी उन्हें समय लगेगा। कुल मिलाकर कांग्रेस में अभी स्थानीय स्तर पर ऐसे मुस्लिम नेताओं का अभाव है जो कांग्रेस को मुस्लिम राजनीति में एक मुकाम दिला सके।
अब जब जलालुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में आ गए हैं तो इसके इफेक्ट दिखाई देंगे। जलालुद्दीन सिद्दीकी राजनीति में एक लंबा अनुभव रखते हैं। मुस्लिमों के अलावा दलितों पर भी उनकी पकड़ ठीक है। राजनीति में सक्रिय रहते हैं। जलालुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस में आने के बाद यहां कांग्रेस की मुस्लिम सियासत की स्टोरी में एक बड़ा ट्वीस्ट आएगा। जलालुद्दीन सिद्दीकी जब कांग्रेस में आएंगे तो वह अपने साथ अपने समर्थकों का एक बड़ा हुजूम लेकर आएंगे। आने वाले समय में जब कांग्रेस विपक्ष के तेवरों के साथ मैदान में उतरेगी तो यहां जलालुद्दीन सिद्दीकी को अपनी ताकत दिखानी होगी। यदि वह भीड़ के लिहाज से अपनी ताकत गाजियाबाद में दिखाएंगे तो इसका सीधा मैसेज दिल्ली के कांग्रेस दरबार में पहुंचेगा।
दो दशक से ज्यादा है सियासत का अनुभव
जलालुद्दीन सिद्दीकी को सियासत में दो दशक से भी ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने बसपा में 1992 में राजनीति शुरू की। बसपा ने उन्हें महानगर अध्यक्ष बनाया और 1992 से लेकर 1993 तक वह बसपा के महानगर अध्यक्ष रहे। इसके बाद उन्हें बसपा में मेरठ जोन का महासचिव बनाया गया। पहली बार वर्ष 1995 में वह बसपा के टिकट पर मेयर का चुनाव लड़े। 1997 में प्रदेश हज कमेटी के सदस्य रहे। वर्ष 2002 से 2005 तक दिल्ली प्रदेश प्रभारी रहे। वर्ष 2006 में उनकी पत्नी हसीना बेगम बसपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में मेयर का चुनाव लड़ीं। यह वह दौर था जब उन्हें गुड़िया चुनाव चिह्न मिला था। इसका कारण भी रोचक बताया जाता है। बसपा यहां जिस उम्मीदवार को चुनाव लड़वाना चाहती थी, वह उम्मीदवार पार्टी का सिंबल न मिलने के कारण भाग गया था और तब बसपा सुप्रीमो मायावती ने जलालुद्दीन सिद्दीकी को बुलाकर चुनाव लड़ने के लिए कहा था। वर्ष 2006 से 2012 तक जलालुद्दीन सिद्दीकी बसपा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे। जब-जब बसपा पर संकट आया, तब-तब जलालुद्दीन सिद्दीकी मैदान में आए। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा उम्मीदवार को पार्टी सुप्रीमो ने निष्कासित कर दिया, तब फिर से बसपा सुप्रीमो ने जलालुद्दीन सिद्दीकी को बुलाया और चुनाव लड़ने के लिए कहा। जलालुद्दीन सिद्दीकी साहिबाबाद से चुनाव लड़े। बड़ी बात यह है कि जलालुद्दीन सिद्दीकी की गिनती अवसरवादी नेताओं में नहीं होती है। वह जिस दल के साथ खड़े होते हैं तो फिर पूरे दिल और पूरी ताकत के साथ उसका साथ देते हैं। यही वजह है कि जब नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर राजनैतिक संकट आया तो जलालुद्दीन सिद्दीकी ने उनके लिए अपने राजनैतिक कॅरियर को बिना सोचे दांव पर लगा दिया और नसीमुद्दीन जब कांग्रेस में गए तो उन्होंने भी जलालुद्दीन सिद्दीकी के साथ ही कांग्रेस का हाथ थामा।

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