हादसों ने पैर, गरीबी ने सुविधाएं छीनीं, ये छीनती हैं पदक

जीवन की थोड़ी-सी मुश्किलों में हिम्मत हारकर लोग गलत कदम उठा लेते हैं, लेकिन गुजरात की तीन टेबल टेनिस खिलाड़ी ऐसी हैं जिन्हें जीवन में बहुत मुश्किलें मिलीं, हादसों ने पैर छीन लिए, पैसों की कमी ने हमेशा परेशान किया…लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि जीवन में मिली दिक्कतों को अपने हौसलों से हराया।

ये कहानियां हैं स्थानीय अभय प्रशाल में गुरुवार से प्रारंभ हुई राष्ट्रीय पैरा टेबल टेनिस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने आईं भाविना पटेल, सोनल पटेल और शीतल दर्जी की। दिव्यांग होने के बावजूद ये देश की शान हैं, कई पदक जीतकर भारत का नाम दुनिया में रोशन कर चुकी हैं।

भाविना : विश्व में 12वां क्रम, क्रिकेटर ने हाथ थाम बनाया जीवन साथी

भाविना विश्व में 12वें क्रम की खिलाड़ी हैं। गुजरात के मेहसाणा जिले के छोटे से गांव सुंडिया के मध्यमवर्गीय परिवार की भाविना 1 साल की उम्र में जब चलना भी नहीं सीखी थी, तभी पोलियो ने पैर छीन लिए। चर्चा करते हुए भाविना के चेहरे पर आत्मविश्वास सामान्य लोगों से ज्यादा नजर आता है। वे बताती हैं, ‘मैं खुद सक्षम बनना चाहती थी, तो किसी के कहने पर ब्लाइंड पीपल्स एसो. नाम की संस्था में कोर्स करने गई। वहीं कुछ लड़कियों को टेबल टेनिस खेलते देखा, तो खेलने का मन हुआ। 2008 में दिल्ली में एक टूर्नामेंट खेलने गई तो तीसरा स्थान मिला।

यहीं से टेबल टेनिस को गंभीरता से लिया, मगर पैसों की तंगी के कारण राह आसान नहीं थी। 2014 में आर्थिक तंगी के कारण बीजिंग (चीन) में विश्व चैंपियनशिप नहीं खेल सकी। रियो पैरालिंपिक की भी पात्रता थी, लेकिन आर्थिक तंगी आड़े आ गई। अब स्लोवेनिया में 15 से 21 अक्टूबर तक होने वाली विश्व चैंपियनशिप में जरूर जाऊंगी, चाहे खुद पैसा खर्च करना पड़े। 13 अंतरराष्ट्रीय पदक जीत चुकीं भाविना के पति को कोई शारीरिक व्याध्ाि नहीं है। वे हंसते हुए बताती हैं, हमारी लव मैरिज है। मेरे पति निकुल पटेल गुजरात में क्रिकेटर थे। वे मेरा बहुत ध्यान रखते हैं। मेरे पिता हसमुख और मां निरंजना ने भी बचपन से अभी तक हमेशा प्रोत्साहित किया।

सोनल : छोटे से गांव से निकल 14 देशों में खेली, देश के लिए 7 पदक जीत

गुजरात के विरमगाम जिले का चनौरिया गांव। देहाती क्षेत्र में सुविधाएं तो दूर, जरूरी चीजों का भी अभाव था। 6 माह की उम्र में जब बच्चे के पैर जमीं पर भी नहीं पड़ते, तब सोनल ने पोलियो के कारण पैर गंवा दिए। यह किस्सा भी सोनल हंसते हुए बताती हैं।

वे कहती हैं, ‘ मैं सरकारी शिक्षिका बनना चाहती थी। एक परीक्षा भी पास कर ली थी, लेकिन पैरों पर खड़े न हो पाने के कारण नहीं बन सकी। फिर किसी ने ब्लाइंड पीपल्स एसो. के बारे में बताया। मैंने जीवन में कभी टेबल टेनिस का नाम भी नहीं सुना था, लेकिन यहां लड़कियों को देखा तो मैं भी खेलने लगी। 2009 में दिल्ली में पहले ही टूर्नामेंट दूसरा स्थान मिला तो लगा मैं भी अच्छा खेल सकती हूं। मैं 2010 में दिल्ली राष्ट्रकुल खेलों में क्वार्टर फाइनल तक खेली। मैं अब तक 14 देशों में खेल चुकी हूं और देश के लिए 7 अंतरराष्ट्रीय पदक भी जीते हैं। अब तक सरकारी नौकरी तो दूर, कई टूर्नामेंट खेलने के लिए भी पैसा नहीं मिलता।

शीतल : रेलवे ट्रेक पर बच्ची को बचाने में पैर गंवाया, पति ने छोड़ा, रैकेट बना साथी

अहमदाबाद की शीतल अपने पति और बेटी के साथ खुशहाल जीवन जी रही थी। 2011 में बावला स्टेशन (अहमदाबाद) में रेलवे ट्रेक पार करते हुए बेटी अचानक दौड़ी, जिसे बचाने के चक्कर में शीतल की साड़ी फंस गई। दुर्घटना के बाद शीतल तीन महीने अस्पताल में रही और गैंगरिन के कारण दोनों पैर काटना पड़े। शीतल अपनी मार्मिक कहानी बताते हुए बिल्कुल भी भावुक नहीं होती। वे कहती हैं, ‘पति और ससुराल के लोगों को लगा कि अब मैं कोई काम नहीं कर सकती, पति भी मुझे कहीं साथ नहीं ले जा सकता। तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैंने बहुत प्रयास किए, लेकिन वे नहीं माने। तब तक मैं सिर्फ 10वीं पास थी, लेकिन फिर मैंने 12वीं की परीक्षा दी। सिलाई और ब्यूटी पार्लर के कोर्स किए।

भाविना और सोनल के प्रोत्साहन से टेबल टेनिस भी खेलने लगी। साथ ही कम्प्यूटर का कोर्स भी कर रही हूं। मैं बीती बातों पर दुख जताने की बजाए, खेल में करियर बनाने पर ध्यान दे रही हूं। मैं भी देश के लिए पदक जीतना चाहती हूं। इन्हीं के साथ अहमदाबाद की दिव्यांग खिलाड़ी उषा राठौर से मुलाकात हुई। उषा कापी और पेन हाथ में लिए पढ़ाई में व्यस्त थीं। पूछने पर कहने लगीं पैरा खिलाड़ियों की समस्याओं को समझने वाले कोच नहीं मिलते। इसलिए मैं खुद कोच बनना चाहती हूं और इसी की पढ़ाई कर रही हूं।

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