संविधान निर्माताओं में थे किशोरी शिक्षा-पंचायतीराज को दिया महत्व

रायपुर . आज देश के संविधान को लागू हुए 70 साल पूरे हो गए हैं और इसे बनाने में छत्तीसगढ़ के सपूतों का भी अहम योगदान रहा है। रायगढ़ के सरिया गांव में पैदा हुए स्वतंत्रता सेनानी और बुद्धजीवी किशोरी मोहन त्रिपाठी इस सविंधान के निर्माण में शामिल रहे हैं। वे संविधान के ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य के साथ संसद के मनोनीत सदस्य भी थे। संविधान में इन्होंने पंचायती राज को शामिल करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। शिक्षा पर जोर और बाल श्रमिक पर रोक को लेकर भी संविधान में सुझाव दिए थे। इसका असर आज देश के साथ, उनके गांव सरिया में भी दिखाई दे रहा है। यहां उन्होंने जनसहयोग से 30 साल पहले महाविद्यालय की स्थापना की, जिसका संचालन आज भी गांववासी मिलकर कर रहे हैं। संविधान निर्माण में योगदान के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद पंडित त्रिपाठी की तारीफ की थी। ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य के तौर पर उनके हस्ताक्षर आज भी मूल संविधान पत्र में हैं।

रायगढ़ में रहने वाले उनके बेटे सुभाष त्रिपाठी बताते हैं कि पिता जी का पूरा जीवन सादगी से बीता। सांसद और 4 बार के विधायक होने के बाद वे पत्रकार- साहित्यकार बने। उनका जन्म शिक्षक परिवार में 8 नवंबर 1912 को तत्कालीन सारंगढ़ रियासत के एक सरिया गांव में हुआ था। उनकी मृत्यु 25 सितंबर 1994 को रायगढ़ में हुई। वे देश की आजादी के आंदोलन में भी काफी सक्रिय रहे हैं। उस दौरान कांग्रेस के रणनीतिकार रहे। आजादी के बाद 1947 में जब पहली बार मनोनीत संसद बनी तो इन्हें मनोनीत कर सांसद (1947-1950) बनाया गया था। सुभाष बताते हैं कि जब अपना संविधान बनाने की घोषणा की उस दौरान तत्कालीन सीपी बरार प्रांत से सिर्फ 4 लोगों को संविधान सभा में लिया गया था, जिनमें वे एक थे। सरिया में जिस जगह उनका जन्म हुआ वह आज खंडहर है। उनके परिवार व गांव के लोग वहां एक स्मारक या लाइब्रेरी बनाना चाहते हैं, जिसके लिए वे शासन से मांग कर रहे हैं।

गांव की जन्मभूमि पर आकर टेकते थे माथा
त्रिलोचन बताते हैं कि आज उनका सपना साकार हो रहा है, सरिया में बच्चे पढ़ रहे हैं। यहां अब दूसरे गांव के बच्चे भी आ रहे हैं। यहां आज 2 शासकीय, 4 प्राइवेट कॉलेज हैं। इसके अलावा गांव में अभी 21 सरकारी व प्राइवेट प्राइमरी से हायर सेकंडरी स्कूल हैं। गांव के प्रति उनका ऐसा प्रेम था कि वे लंबे समय से रायगढ़ में ही रहते थे, लेकिन कभी कभी अपने गांव आते थे तो जिस जन्म वाले घर जरूर जाते थे और वहां जाकर जमीन पर माथा टिकाकर प्रणाम करते थे। अपने नाती पोते को भी लाकर प्रणाम कराते थे। गांव के ही रिटायर्ड शिक्षक कलाकान्हू श्राफ़ बताते हैं त्रिपाठी जी ने गांव के पढ़े लिखे कई युवाओं को शिक्षक की नौकरी दिलवाई, उनका भी उन्होंने ने ही नौकरी लगवाई थी। सरिया के लोगों से काफी प्रेम करते थे।

नहीं चाहते थे कहीं उनका नाम हो
रिटायर्ड लेक्चरर पटेल का कहना है कि त्रिपाठी जी कहीं भी अपना नाम या योगदान का वर्णन नहीं चाहते थे। उनसे कई बार कहा भी गया तो वे मना कर देते थे। जिस कॉलेज को उन्होंने जनसहयोग से शुरू किया उसमें भी अपना नाम नहीं देने दिया। गांव वालों का जरूर कहना है कि इनके नाम से कुछ तो होना चाहिए। 4 साल पहले बने शासकीय कॉलेज का नाम भी उनके नाम पर नहीं रखा गया। रायगढ़ में उनके नाम से गर्ल्स कॉलेज है। सरिया गांव में ना किसी स्कूल, ना कॉलेज और न ही किसी चौक- दफ्तर में उनका नाम या प्रतिमा लगी है।

किताबों में उल्लेख संविधान में दिए गए उनके योगदान
सुभाष त्रिपाठी ने बताया कि वरिष्ठ वकील कनक तिवारी ने संविधान के बारे में एक पुस्तक लिखी है, जिसमें पिताजी का संविधान के निर्माण में अहम भूमिका के बारे में बताया गया है। उसमें लिखा है कि कैसे किशोरी मोहन त्रिपाठी ने पंचायती राज को संविधान में लाने के लिए अथक प्रयास किया। इसके साथ वे बाल श्रम प्रतिषेध को भी वे संविधान में शामिल करना चाहते थे, उस दौरान वह संविधान में तो शामिल नहीं हो पाया। लेकिन बाद में वह बाल श्रम कानून के रूप में लागू हुआ।

युवाओं के लिए चंदे से कॉलेज बनवाया
सरिया गांव के रिटायर्ड लेक्चरर और त्रिपाठी जी को जानने वाले त्रिलोचन पटेल बताते हैं कि युवा ज्यादा पढ़े और आगे बढ़े, यह उनकी सोच थी। वे कहते हैं कि 7 सितंबर 1990 की बात है, जब त्रिपाठी जी ने अशासकीय पूर्वांचल महाविद्यालय की स्थापना की। उन्होंने देखा था कि यहां के बच्चों को 12वीं के बाद रायपुर व बिलासपुर जाना पड़ता है। उन्होंने इस कॉलेज के लिए जनसहयोग से पहले 1.50 लाख रुपए कॉलेज खोलने की मान्यता की राशि जुटाई और इसके बाद उसकी जमीन भरत लाल साहू के साथ प्रधान व पटेल समुदाय की जमीन पर कॉलेज खुलवाया। अभी 250 छात्र पढ़ रहे हैं।

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