PM मोदी कर रहें हैं ‘प्रोग्रेस मैनेजरों’ के साथ मंथन

नई दिल्ली .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अपने प्रोग्रेस मैनेजर्स के साथ विचार मंथन शुरू करने जा रहे हैं। आप सोच में पड़ गए होंगे कि कौन हैं ये पीएम मोदी के प्रोग्रेस मैनेजर. आखिर इनके साथ बैठकें क्यों हो रहीं हैं?

दरअसल ये मंथन मोदी की आउट ऑफ बॉक्स सोच का नतीजा है. और प्रोग्रेस मैनेजर हैं वो सीनियर अधिकारी जो सरकार के फ्लैगशिप प्रोग्रामों को अमली जामा पहनाते हैं. ये अधिकारी संयुक्त सचिव और उनसे ऊपर की रैंक के अधिकारी हैं. पीएम मोदी ने उनके साथ चर्चा की शुरुआत कर के एक अनूठी पहल की है. ये पहला मौका है जब कोई पीएम योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर अपने शीर्ष अधिकारियों से सीधा संवाद कर रहा है.

दरअसल एनडीए सरकार बनने के बाद पीएम मोदी ने प्रगति कार्यक्रम की शुरुआत की थी. इसमें राज्यों के मुख्य सचिवों और जिला कलेक्टरों के साथ वीडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिए विकास का लेखा-जोखा लेना शुरू किया गया था. लेकिन अब सरकार ने दर्जन भर से ज्यादा गरीबों और पिछड़ों के उत्थान के लिए कार्यक्रम शुरू किए हैं और पीएम इन विकास के कामों को गति भी देना चाहते हैं. इसलिए इन प्रोग्रेस मैनेजरों से उनकी राय भी ली जा रही है और उन्हें ये भी कहा जा रहा है कि वो शिथिलता से निकलकर अब विकास के कामों में जुटें.

खुद पीएम मोदी ने इस मंथन की रूपरेखा तैयार की है. भारत सरकार के कुल 60 से 70 ज्वाइंट सेक्रेट्री और एडिशनल सेक्रेट्रियों के समूह बनाये गए हैं. इन्हें कुल पांच समूहों में बांटा गया है. 23 से 30 अगस्त तक इनकी पांच बैठकें भी होंगी. अब तक दो बैठकें हो चुकीं है. अधिकारियों ने डिजिटल और स्मार्ट गवर्नेंस पर अपने विचार भी पीएम मोदी के सामने रखे हैं. और पीएम ने भी उन्हें दो टुक यही संदेश दिया है कि गुड गवर्नेंस यानि सुशासन ही उन सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए.

अपनी पहली बैठक में 70 अधिकारियों की मौजूदगी में पीएम ने कहा कि अधिकारियों को देश के सबसे पिछड़े 100 जिलों के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाए बिना देश के विकास को गति नहीं मिलने वाली. दूसरी बैठक में 80 अधिकारी मौजूद थे. इस बार पीएम ने अधिकारियों को कहा कि वो फाइलों में न सिमटते हुए मैदान में कूदें और देखें कि उनके फैसलों का क्या असर हो रहा है. पीएम मोदी ने कहा की अधिकारी काम को ड्यूटी की तरह नहीं बल्कि इसे गवर्नेंस में बदलाव के मौके के रूप में देखें.

पहली बार ऐसा मौका आया है जब पीएम अधिकारियों से सीधी बात कर रहा है. ज्यादातर अधिकारी तो बैठक में मौजूद रहते हैं लेकिन जो दिल्ली के बाहर ड्यूटी कर रहे हैं, उन्हें भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जोड़ा जा रहा है. तय है कि वो बाबू जिन्हें ब्रिटिश सम्राज्य का स्टील फ्रेम कहा जाता था, उन्हें उस पुरानी मानसिकता से बाहर निकालने की ये कोशिश है. और आजादी के 70 साल बाद भी यही माना जाता रहा है कि ये बाबू ही सरकार चलाते हैं. अगर पीएम मोदी अपने इस आउट ऑफ बॉक्स आइडिया से इस सोच को बदल पाएं तो शायद विकास को नयी दिशा मिलेगी.

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