‘ग्रे लिस्ट’ में पाकिस्तान

‘‘पाकिस्तान 19 करोड़ 30 लाख लोगों का लोकतंत्र है परंतु राष्ट्रीय सुरक्षा तथा विदेश नीति को निर्धारित करने वाली ताकत जनता की चुनी हुई सरकार नहीं बल्कि खुफिया एजैंसी आई.एस.आई. के हाथों में है। 25 हजार के स्टाफ वाली एजैंसी के सरकारी अधिकारी, जनरल तथा उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारी एजैंसी के डायरैक्टर के साथ ऐसे पेश आते हैं जैसे वही देश का सर्वोच्च अथवा सुप्रीम लीडर हो। इसकी सर्वाधिक खुफिया शाखा ‘डायरैक्टोरेट एस’ तालिबान तथा कश्मीरी आतंकियों के सहयोग के लिए गुप्त अभियानों को नियंत्रित करती है।’’

यह बयान किसी भारतीय अधिकारी अथवा पत्रकार ने अमेरिकी सरकार को नहीं दिया है बल्कि पत्रकार स्टीव कोल ने अपनी पुस्तक ‘डायरैक्टोरेट एस’ में यह सब लिखा है। इससे पहले पुलित्जर पुरस्कार विजेता अपनी पुस्तक ‘घोस्ट वार्स’ में उन्होंने बताया था कि किस तरह अफगानिस्तान में 16 वर्ष तक चला अमरीकी युद्ध व्यर्थ रहा क्योंकि आई.एस.आई. तालिबान को वित्त पोषित तथा प्रशिक्षित करती रही और साथ ही कश्मीर के लिए भी आतंकियों को उसने तैयार किया।

पाक पर लगाम कसने के स्टीव के सुझाव पर काफी कुछ कहा जा रहा है। वास्तव में उसे दी जा रही सहायता राशि में भारी कटौती की जनवरी में घोषणा, चीन व सऊदी अरब पर दबाव डाल कर उसे एफ.ए.टी.पी. की ‘ग्रे लिस्ट’ में डालने के लिए कुछ घंटों के भीतर प्रस्ताव पुन: पेश करके ट्रम्प सरकार ने पाकिस्तानी सेना द्वारा आतंकवादियों की सहायता के उद्देश्य से की जा रही गतिविधियों को कुचलने के प्रति मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई है। हालांकि, पाकिस्तानी मीडिया अभी भी इस बात से इंकार कर रहा है कि एफ.ए.टी.एफ. यानी ‘फाइनैंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ उसे ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल करने को सहमत हो गया है।

आतंकवादी संगठनों को फंड्स के प्रवाह पर नजर रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था एफ.ए.टी.एफ. की ‘ग्रे लिस्ट’ में पाकिस्तान को शामिल करने के प्रस्ताव को पहले तो चीन, रूस और सऊदी प्रभाव के तहत जी.सी.सी. (गल्फ कोऑप्रेशन काऊंसिल) ने वीटो कर दिया था परंतु एफ.ए.टी.पी. की मंत्रणा के खत्म होने से पहले ही पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा मास्को से किए ट्वीट को गोपनीयता का उल्लंघन बताते हुए अमेरिका ने काऊंसिल में प्रस्ताव पुन: पेश कर दिया। यह भी गौरतलब है कि इसके लिए अमेरिका को एफ.ए.टी.एफ. काऊंसिल में टॉप पोजिशन के लिए चीन के दावे का समर्थन तथा ताईवान पर भी अपना रुख नर्म करना पड़ा है।

पाकिस्तान के इंफ्रास्ट्रक्चर में 800 बिलियन का निवेश चीन कर रहा है पर हाल के दिनों में ब्लूचिस्तान में रेल लाइन बिछाने को लेकर उसे स्थानीय लोगों के विरोध व आतंकियों की धमकियों का सामना करना पड़ा है। भारत ने रूस को तटस्थ करने में मदद दी तो अमरीका व यूनाटेड किंगडम के साथ जर्मनी ने सऊदी अरब पर दबाव डाला कि वह अपना वीटो बदले। अब पाकिस्तान को जून से निगरानी पर रखा जाएगा। एफ.ए.टी.एफ. की ‘ग्रे लिस्ट’ में आने से बचने के लिए पहले ही पाकिस्तान ने जे.यू.डी., एल.ई.टी., फलाह इंसानियत फाऊंडेशन जैसे संगठनों के फंड, सम्पत्तियों आदि को कब्जे में लेकर यह दिखाने का प्रयास किया था कि वह आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। पाकिस्तान को आई.एम.एफ., वल्र्ड बैंक तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय ऋण प्रदाताओं की ओर से सख्ती झेलने के अलावा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी उसे कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

2011 से 2015 तक इस सूची में रहने की पूरी प्रक्रिया से पहले ही गुजर चुके पाकिस्तान को पता है कि किस तरह नजरों से दूर रहना है पर पिछली बार की तरह इस बार उसके पास अमरीकी सैन्य व वित्तीय सहयोग नहीं होगा।

ऐसे में इसके क्या महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकते हैं?
1. चुनाव वर्ष में नागरिक चाहेंगे कि मजबूत सिविलियन सरकार आए लेकिन सेना पृष्ठभूमि में रहते हुए अपने इशारों पर नाचने वाली सरकार लाने के प्रयास करेगी।
2. पाकिस्तान लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भारतीय सीमा पर हालात गम्भीर कर सकता है। बिलावल भुट्टो के नेतृत्व में पी.पी.पी. पहले ही भारत के खिलाफ आक्रामक रुख दिखा रही है।
3. अफगानिस्तान में धन के अभाव में तालिबान कमजोर पड़ सकता है।
चूंकि ट्रम्प सरकार अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान समस्याओं को ओबामा के विपरीत वहां से सेना हटाए बिना हल करना चाहती है, आने वाले महीनों में अपनी ताकत बरकरार रखने के लिए वहां सेना नए तरीकों की तलाश में होगी।

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