नक्सली मांद में काल बनकर घुसती है कांति

नारायणपुर। अबूझमाड़ के ग्राम पहालूर की कांति ने जोश, जुनून और जज्बे की बदौलत अपनी अलग पहचान बनाई है। उसने बचपन में चाचा की नक्सली हत्या और पिता पर लाठियां बरसती देखीं। फिर भी पांव नहीं डगमगाए। आज वह अपने पांव पर खड़ी है। आरक्षक बनकर नक्सलियों की नाक में कांति ने दम कर दिया है।

बस्तर में जब नक्सली हिंसा चरम पर थी, नारायणपुर जिले में सबसे पहले डीआरजी (डिस्ट्रिक रिजर्व गार्ड) की बुनियाद रखी गई थी। इस समय माड़ की छोटी कद-काठी वाली कांति कुमेटी सुरक्षाबल की मार्गदर्शिका बनकर कई ऑपरेशन में साथ दिया।

कांति बताती हैं कि माड़ के कोहकामेटा कन्या छात्रावास में रहकर आठवीं में पढ़ रही थी, तब नक्सलियों ने कोहकामेटा में चौपाल लगाकर छात्रावास की लड़कियों को संगठन में भर्ती होने के लिए दबाव बनाया। वह डरकर रिश्तेदार के घर एड़का चली गई।

कुछ दिन बाद लौटी तो नक्सली जबरिया साथ ले गए। किसी तरह भागकर पलाहूर आ गई। इससे नाराज नक्सली गांव पहुंचे और चाचा कमलूराम उर्फ सागर की हत्या कर दी। पिता दोवाराम को लाठियों से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। उसके परिवार को गांव से भगा दिया। जमीन-जायदाद छोड़कर जिला मुख्यालय की मुखबिर बस्ती शरण ले ली।

इसी दौरान बस्तर में एसपीओ की भर्ती में उसका चयन हो गया। 2007 से सुरक्षाबल के साथ गश्त पर जाने लगी। नक्सलियों के ठौर-ठिकाने पहले से जानती थी। गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग भी ली थी। इससे काफी मदद मिली। फोर्स के साथ मिलकर कई सफल ऑपरेशन चलाए।

पुरुष जवानों के साथ दस-दस दिन माड़ में रही। एक ऑपरेशन में किसकोड़ो एरिया कमेटी की महिला कमांडर कमला को मार गिराया था। इस पर उसे आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देकर आरक्षक बना दिया गया है। 2014 में उसने शादी की और आज पिता, पति व बेटी के साथ पारिवारिक जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही है।

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