किराया दीजिए और हवाईअड्डा लीजिए!

अग्रणी शीतल पेय कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी पिछले दिनों लखनऊ हवाईअड्डे की व्यवस्था से काफी नाखुश दिखे थे। उनका कहना था कि वहां बैठने की जगह न के बराबर थी, शौचालय गंदे थे, जिसे किसी भी सूरत में सुखद अनुभव नहीं कहा सकता। भारतीय हवाईअड्डों के चेक-इन काउंटरों पर यात्रियों की लंबी कतार अब आम हो गई है। मध्यवर्ग के विकास और हवाई टिकट सस्ते होने की वजह से पिछले पांच साल के दौरान बड़े या मझोले शहरों में हवाई यातायात में खासी तेजी आई है।

ट्रैवल पोर्टल मेकमाईट्रिप के एक अध्ययन के मुताबिक घरेलू यातायात में महानगरों की हिस्सेदारी मुश्किल से एक चौथाई है और 75 फीसदी यात्री छोटे शहरों से आते हैं। लेकिन इन हवाईअड्डों पर बुनियादी ढांचा दुरुस्त नहीं है, जिससे उड़ान में देर तो होती ही है, दूसरी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) जिन 126 हवाई अड्डों परिचालन करता है, उनमें से 10 में एक साल के दौरान 3 करोड़ यात्रियों की आवाजाही होती है और नरेंद्र मोदी सरकार इन हवाईअड्डों के वाणिज्यिक अवसरों के दोहन के लिए निजी क्षेत्र को आकर्षित करना चाहती है। इसके लिए पहला विकल्प है कि टर्मिनल के प्रबंधन का 15 साल का पट्टा देना और इस दौरान बोलीदाता को पहले से निर्धारित किराया चुकाना होगा। किराये की रकम का निर्धारण प्रति यात्री अर्जित राजस्व के आधार पर तय किया जा सकता है। दूसरा विकल्प यह है कि टर्मिनल पर सभी तरह का पूंजीगत निवेश एएआई द्वारा किया जाएगा। उसके बाद ऑपरेटर को एएआई को पहले से तय किराया चुकाना होगा। इससे विमानन से इतर गतिविधियों जैसे खानपान कारोबार, टर्मिनल की जगह को पट्टे पर देने आदि से अतिरिक्त आय जुटाने में मदद मिल सकती है।

अहमदाबाद और जयपुर हवाईअड्डों के निजीकरण के लिए जिस मॉडल को अपनाया जा रहा है, वह दिल्ली और मुंबई हवाईअड्डों के मॉडल से अलग है। दिल्ली, मुंबई हवाईअड्डे पर बोलीदाता का चयन एएआई को दिए जाने वाले उच्चतम राजस्व हिस्सेदारी के आधार पर किया गया था। इससे डेवलपर के लिए निवेश पर रिटर्न हासिल करने की संभावना सीमित होती है, जिसकी वजह से वह शुल्क बढ़ा देते हैं।

सरकार के अधिकारी ने कहा कि फ्लगहैफेन ज्यूरिख एजी, ईजिस एयरपोर्ट और डीएए इंटरनैशनल जैसे वैश्विक दिग्गजों ने नए मॉडल के तहत अहमदाबाद और जयपुर परियोजनाओं में रुचि दिखाई है। विमानन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने नए मॉडल को दोनों के लिए लाभकारी बताया है। उन्होंने कहा कि अगले 10 साल में हवाईअड्डों की क्षमता को दोगुनी करने के लिए करीब 3 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी और इनमें से ज्यादातर निवेश निजी क्षेत्र से आएगा।

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