400 ग्राम रेत और पत्थर,चट कर जाता है ये 80 साल का आदमी

हमारे और आपके खाने में अगर रेत के कुछ कण पड़ जाएं तो दांत जवाब दे जाते हैं। लेकिन 80 साल के ये बुजुर्ग हर रोज 400 ग्राम से अधिक रेत को बड़े आराम से चट कर जाते हैं। ऐसा वे पिछले 20 साल से करते आ रहे हैं। लेकिन ना तो उन्हें दांतों की समस्या है और ना ही पाचन तंत्र को लेकर कोई दिक्कत।

जब भी वे घर से बाहर निकलते हैं तो रुकने के हिसाब से रेत की पोटली लेना नहीं भूलते। लेकिन मजे की बात यह है कि उन्हें रेत केवल केन और बागे नदी की ही चाहिए। जो बुंदेलखंड से होकर गुजरती हैं।

रेत की फांक मुह में लेकर चबाते रहते हैं

उप्र के बांदा जिले के अतर्रा निवासी 80 वर्षीय मोहनलाल देवराज को इस तरह रेत खाते हुए देखना आश्चर्य में डाल देता है। कई बार तो उन्हें देखने वाले मनोवैज्ञानिक डर की वजह से भाग खड़े होते हैं। लेकिन मोहनलाल बेपरवाह रेत की फांक मुह में लेकर चबाते और निगलते रहते हैं। वे सतना शहर के बगहा में एक रिश्तेदार के घर पर आए थे।

देखने वालों की भीड़ जुटी

शादी कार्यक्रम के दौरान वे रेत की पोटली साथ लाए थे और उसे निकालकर पंजीरी की तरह फांकते रहे। देखने वालों की भीड़ जुटी तो खिसक लिए। पत्रिका से बात करते हुए बताया कि उन्हें रेत खाते 20 साल हो गए लेकिन कोई समस्या नहीं हुई। दरअसल वे शारीरिक समस्या को दूर करने के लिए ही तो इसे फांकते हैं। पाचन तंत्र सहित तमाम क्रियाओं को सामान्य बताया।

रेत से मिला प्यास का हल

80 वर्षीय बुजुर्ग मोहनलाल ने बताया कि रेत खाने के पीछे उनकी बीमारी है। 55-60 साल की उम्र के दौरान उन्हेें अजीब बीमारी ने घेर लिया। कितना भी पानी पी लें लेकिन गला सूख जाता था। पानी पी-पीकर परेशान हो गए। अतर्रा और बांदा से लेकर लखनऊ तक डाक्टरों को दिखाया पर कोई राहत नहीं मिली।

संत ने दी रेत खाने की शिक्षा

वे गोरखपुर घूमने गए थे, उसी दौरान एक संत से भेट हो गई। बातों-बातों में समस्या बताई तो कहा बहुत सहज दवा है। रोज रेत खाओ सब सही हो जाएगा। मोहनलाल ने बताया कि रेत खाना शुरु करते ही सही में उनकी समस्या दूर हो गई। इस तरह 20 साल हो गए। रेत उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा हो गई है।

महज दो रोटी की खुराक

अगर रिश्तेदारों की माने तो 400 ग्राम रेत फांक जाने वाले मोहनलाल की डाइट अत्यधिक कम हो गई है। दिनभर में वे बमुश्किल 2 रोटी खाते हैं। सब्जी भी नाममात्र की चाहिए। मोहनलाल गांधी टोपी लगाते हैं। जिस पर रेत खाने वाला बाबा लिखा हुआ है। ये टोपी है, पूरे क्षेत्र में उनकी पहचान है। वे हमेशा टोपी लगाए रहते हैं। साथ ही कुर्ता पायजामा पहनते हैं।

केवल दो नदी की रेत खाते

मोहन लाल कहीं की भी रेत नहीं खाते। केवल दो नदी की रेत खा पाते हैं। वे बताते हैं कि बागे व केन नदी की रेत ही खाते हैं। इसके पीछे कारण है कि अन्य रेत की अपेक्षा इन दो नदियों की रेत चिकनी होती है।

चिकित्सा विज्ञान के लिए हैरान करने वाला केस

मोहनलाल का केस चिकित्सा विज्ञान को भी हैरत में डालने वाला है। जिला अस्पताल सतना के मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र शर्मा ने बताया कि मिट्टी, चाक, छुही व अन्य चीजें खाने के कई उदाहरण मिलते हैं ऐसा शरीर में कैलिशियम व अन्य तत्वों की कमी की वजह से होता है और लोग लती हो जाते हैं। लेकिन इतने लंबे समय तक रेत खाना थोड़ा अलग केस है।

रेत व मिट्टी के खाने से होती है पायका बीमारी

जिसका अध्ययन करके ही स्थिति का पता लगाया जा सकता है। फिर भी रेत व मिट्टी के खाने से पायका बीमारी होती है, इसके अलावा पेट में कीड़े भी हो सकते हैं। कुछ लोग अलग अलग चीजों को खाते हैं लेकिन इस तरह की चीजों का निरंतर सेवन करने से परेशानी बढ़ सकती है।

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